EV क्रांति: क्या भारत के ऑटोमोबाइल सेक्टर में ‘टेक्नीशियन’ की कमी सबसे बड़ी चुनौती बनेगी?
EV (Electric Vehicle) Technician: भारत का ऑटोमोबाइल सेक्टर एक बड़े बदलाव के मुहाने पर खड़ा है। सड़कों पर बढ़ती इलेक्ट्रिक गाड़ियों की संख्या सिर्फ पर्यावरण के लिए अच्छी खबर नहीं है, बल्कि यह करोड़ों युवाओं के लिए करियर के नए रास्ते भी खोल रही है। हालांकि, इस बदलाव के साथ एक गंभीर सवाल भी जुड़ा है: क्या हमारे पास इन हाई-टेक गाड़ियों को संभालने के लिए कुशल वर्कफोर्स तैयार है?
Quick Highlights: EV सेक्टर में रोजगार का परिदृश्य

| मुख्य बिंदु | विवरण |
| सेक्टर | इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसिंग |
| प्रमुख स्किल्स | बैटरी मैनेजमेंट (BMS), मोटर कंट्रोलर, सॉफ्टवेयर डायग्नोस्टिक्स |
| रोजगार की संभावना | 2030 तक लगभग 1 करोड़ नए डायरेक्ट और इनडायरेक्ट जॉब्स |
| चुनौती | पारंपरिक मैकेनिक्स और आधुनिक EV टेक्नोलॉजी के बीच स्किल गैप |
| सैलरी ट्रेंड | सामान्य ऑटो-मैकेनिक की तुलना में 25-40% अधिक शुरुआती पैकेज |
पारंपरिक मैकेनिक्स से डिजिटल एक्सपर्ट्स तक का सफर
दशकों से भारत का ऑटोमोबाइल रिपेयर इकोसिस्टम ‘जुगाड़’ और अनुभव पर टिका रहा है। एक आम मैकेनिक इंजन की आवाज सुनकर खराबी बता देता था। लेकिन इलेक्ट्रिक गाड़ियों ने इस पूरी प्रक्रिया को बदल दिया है। अब इंजन की जगह लिथियम-आयन बैटरी पैक है और गियरबॉक्स की जगह इलेक्ट्रिक मोटर्स ने ले ली है।
एक EV टेक्नीशियन का काम अब सिर्फ पाना-पेचकस तक सीमित नहीं रहा। उसे लैपटॉप और डायग्नोस्टिक टूल्स का इस्तेमाल करना पड़ता है। यह बदलाव ऑटोमोबाइल सेक्टर को ‘मैकेनिकल’ से ‘इलेक्ट्रॉनिक’ डोमेन की तरफ ले जा रहा है। यही कारण है कि अब वर्कशॉप्स में तेल से सने हाथों वाले मैकेनिक के बजाय लैब कोट पहने हुए स्किल्ड प्रोफेशनल्स की डिमांड बढ़ रही है।
डिमांड और सप्लाई का बढ़ता अंतर
इंडस्ट्री रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत में EV की बिक्री में हर साल लगभग 40-50% की ग्रोथ देखी जा रही है। टाटा मोटर्स, महिंद्रा और ओला इलेक्ट्रिक जैसे बड़े नाम प्रोडक्शन बढ़ा रहे हैं। लेकिन, जितनी तेजी से गाड़ियां सड़कों पर आ रही हैं, उतनी तेजी से उन्हें ठीक करने वाले हाथ तैयार नहीं हो रहे।
- सर्विस सेंटर की कमी: छोटे शहरों में EV खरीदने से लोग इसलिए कतरा रहे हैं क्योंकि वहां क्वालिफाइड टेक्नीशियन मौजूद नहीं हैं।
- अपस्किलिंग की जरूरत: देश में मौजूद लाखों पुराने मैकेनिक्स को नई टेक्नोलॉजी के साथ तालमेल बिठाने के लिए ट्रेनिंग की सख्त जरूरत है।
- एजुकेशन गैप: इंजीनियरिंग और डिप्लोमा कॉलेजों का सिलेबस अभी भी काफी हद तक इंटरनल कंबशन इंजन (ICE) पर केंद्रित है।
EV टेक्नीशियन के लिए आवश्यक मुख्य स्किल्स
अगर कोई युवा इस क्षेत्र में करियर बनाना चाहता है, तो उसे सिर्फ गाड़ी के पुर्जों की जानकारी होना काफी नहीं है। उसे कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में महारत हासिल करनी होगी:
- बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम (BMS): बैटरी कैसे चार्ज होती है, सेल बैलेंसिंग क्या है और थर्मल मैनेजमेंट कैसे काम करता है, इसकी गहरी समझ अनिवार्य है।
- हाई वोल्टेज सेफ्टी: पेट्रोल गाड़ियों में 12V की बैटरी होती है, जबकि EV में 300V से 800V तक का करंट हो सकता है। सुरक्षा मानकों की जानकारी जान बचाने के लिए जरूरी है।
- सॉफ्टवेयर और कोडिंग: आधुनिक EV एक ‘कंप्यूटर ऑन व्हील्स’ की तरह हैं। कई बार गाड़ी की समस्या को सिर्फ एक सॉफ्टवेयर अपडेट से ठीक किया जा सकता है।
- सेंसर टेक्नोलॉजी: ADAS (Advanced Driver Assistance Systems) जैसी सुविधाओं के आने से सेंसर्स की रिपेयरिंग एक अलग विशेषज्ञता बन गई है।
सरकार और प्राइवेट सेक्टर की भूमिका
भारत सरकार की ‘FAME’ स्कीम और ‘PLI’ योजना ने मैन्युफैक्चरिंग को तो बढ़ावा दिया है, लेकिन अब ध्यान ‘स्किल इंडिया’ के तहत ट्रेनिंग पर केंद्रित किया जा रहा है। कई ITI (Industrial Training Institutes) ने अब विशेष रूप से ‘EV मैकेनिक’ कोर्स शुरू किए हैं।
प्राइवेट कंपनियां भी पीछे नहीं हैं। कई स्टार्टअप्स अब ‘माइक्रो-लर्निंग’ मॉड्यूल के जरिए स्थानीय गैरेज मालिकों को ट्रेनिंग दे रहे हैं। इसका सीधा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा, जहां छोटे वर्कशॉप्स अब खुद को अपग्रेड करके अपनी कमाई बढ़ा सकते हैं।
भविष्य का रोडमैप: क्या उम्मीद करें?
आने वाले पांच सालों में हम देखेंगे कि ऑटोमोबाइल शोरूम्स के साथ-साथ डेडिकेटेड ‘EV क्लिनिक्स’ खुलेंगे। जैसे स्मार्टफोन के आने से मोबाइल रिपेयरिंग की एक नई इंडस्ट्री खड़ी हो गई थी, ठीक वैसा ही कुछ इलेक्ट्रिक व्हीकल के साथ होने जा रहा है।
रोजगार के अवसर सिर्फ गाड़ियां बनाने या ठीक करने तक सीमित नहीं रहेंगे। चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का रखरखाव, बैटरी रिसाइकलिंग प्लांट्स और चार्जिंग स्टेशन मैनेजर्स जैसे नए रोल भी इसी इकोसिस्टम का हिस्सा होंगे।
सुरेंद्र का नज़रिया (Analysis)
ऑटोमोबाइल सेक्टर में आ रहा यह बदलाव केवल एक तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि एक आर्थिक क्रांति है। डेटा बताता है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए भारी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है। EV की तरफ शिफ्ट होना देश की अर्थव्यवस्था के लिए अनिवार्य है।
मेरा विश्लेषण कहता है कि:
- हाइब्रिड मॉडल की जरूरत: हमें अचानक से पुराने मैकेनिक्स को दरकिनार नहीं करना चाहिए। एक ऐसे मॉडल की जरूरत है जहां ICE और EV दोनों की समझ रखने वाले ‘हाइब्रिड टेक्नीशियन’ तैयार किए जाएं।
- सैलरी और सम्मान: इस सेक्टर में सबसे अच्छी बात यह है कि यह प्रोफेशन अब ‘ब्लू-कॉलर’ से ‘ग्रे-कॉलर’ जॉब की तरफ बढ़ रहा है। इससे युवाओं में इस काम के प्रति सम्मान बढ़ेगा और बेहतर वेतन भी मिलेगा।
- चुनौती का समाधान: सबसे बड़ी बाधा ‘ट्रेनिंग की लागत’ है। छोटे शहरों के मैकेनिक्स के लिए महंगे कोर्सेस करना मुश्किल है। यहाँ सरकार को सब्सिडी आधारित सर्टिफिकेशन प्रोग्राम लाने चाहिए।
निष्कर्षतः, EV टेक्नीशियन सिर्फ एक नौकरी नहीं है, बल्कि यह आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक महत्वपूर्ण कड़ी है। जो युवा आज इस नई टेक्नोलॉजी में निवेश (समय और शिक्षा) करेंगे, वे कल के ऑटोमोबाइल मार्केट के लीडर होंगे।
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