बिहार के कृषि जगत में पिछले कुछ समय से चल रही चर्चाओं पर अब विराम लग गया है, क्योंकि सरकार ने किसानों की आर्थिक सुरक्षा को लेकर एक बड़ा अपडेट जारी किया है। राज्य के सहकारिता विभाग ने बिहार फसल सहायता योजना (रबी 2025-26) के लिए ऑनलाइन आवेदन की प्रक्रिया को आधिकारिक तौर पर हरी झंडी दिखा दी है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब बेमौसम बारिश और जलवायु परिवर्तन की वजह से रबी फसलों पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। इस बार योजना का दायरा न केवल बढ़ाया गया है, बल्कि तकनीकी रूप से भी इसे अधिक पारदर्शी बनाने की कोशिश की गई है।
बिहार के किसानों के लिए रबी सीजन में बड़ी राहत

Quick Facts: बिहार फसल सहायता योजना 2026
| मुख्य बिंदु | विवरण |
| योजना का नाम | बिहार फसल सहायता योजना (रबी 2025-26) |
| नोडल विभाग | सहकारिता विभाग, बिहार सरकार |
| आवेदन की अवधि | 01 जनवरी 2026 से 31 मार्च 2026 तक |
| अधिकतम सहायता राशि | ₹10,000 प्रति हेक्टेयर (20% से अधिक नुकसान पर) |
| न्यूनतम सहायता राशि | ₹7,500 प्रति हेक्टेयर (20% तक नुकसान पर) |
| मुख्य लाभार्थी | रैयत, गैर-रैयत और आंशिक रूप से दोनों श्रेणियों के किसान |
| भुगतान का तरीका | DBT (Direct Benefit Transfer) के माध्यम से सीधा बैंक खाते में |
| आधिकारिक वेबसाइट | esahkari.bihar.gov.in |
रबी 2026: आखिर क्यों यह योजना बिहार के किसानों के लिए ‘लाइफलाइन’ है?
बिहार की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा खेती पर टिका है, और रबी सीजन—जिसमें गेहूं, मक्का और दलहन जैसी प्रमुख फसलें उगाई जाती हैं—किसानों के लिए साल का सबसे महत्वपूर्ण समय होता है। फसल सहायता योजना केवल एक मुआवजा मात्र नहीं है, बल्कि यह किसानों के लिए एक रिस्क मैनेजमेंट टूल की तरह काम करती है।
इस साल सरकार ने आवेदन की प्रक्रिया 1 जनवरी 2026 से शुरू की है, जो मार्च के अंत तक चलेगी। इस लंबी अवधि का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी पात्र किसान तकनीकी या सूचना के अभाव में छूट न जाए। योजना के तहत, यदि किसी प्राकृतिक आपदा के कारण किसान की फसल 20% तक क्षतिग्रस्त होती है, तो उसे ₹7,500 प्रति हेक्टेयर के हिसाब से सहायता दी जाएगी। वहीं, यदि नुकसान 20% की सीमा को पार कर जाता है, तो सहायता राशि बढ़ाकर ₹10,000 प्रति हेक्टेयर कर दी गई है।
योजना की पात्रता और आवश्यक दस्तावेजों का विश्लेषण
सरकार ने इस बार पात्रता के मानदंडों को बहुत स्पष्ट रखा है ताकि बिचौलियों की भूमिका को खत्म किया जा सके। आवेदन करने के लिए किसान का बिहार का मूल निवासी होना अनिवार्य है और उसकी आयु कम से कम 18 वर्ष होनी चाहिए।
आवश्यक दस्तावेजों की सूची:
- आधार कार्ड: पहचान और DBT सत्यापन के लिए।
- भूमि विवरण: खाता संख्या, खसरा संख्या और कंप्यूटरीकृत जमाबंदी संख्या।
- फसल विवरण: बुवाई की गई फसल का नाम और कुल रकबा (एरिया) की सटीक जानकारी।
- स्व-घोषणा पत्र: विशेषकर गैर-रैयत किसानों के लिए वार्ड सदस्य या कृषि सलाहकार द्वारा सत्यापित दस्तावेज।
फसलवार आवेदन की समय सीमा: समय का ध्यान रखना है जरूरी
इस योजना की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सभी फसलों के लिए आवेदन की अंतिम तिथि एक समान नहीं है। सरकार ने फसल की कटाई और बुवाई के चक्र को देखते हुए अलग-अलग डेडलाइन तय की है:
- 31 जनवरी 2026: राई-सरसों और आलू के लिए आवेदन की अंतिम तिथि।
- 15 फरवरी 2026: चना, मसूर और रबी प्याज के लिए।
- 28 फरवरी 2026: गेहूं, रबी मकई, ईख, और रबी टमाटर/बैंगन के लिए।
- 31 मार्च 2026: रबी-अरहर, रबी मिर्ची और गोभी के लिए।
किसानों को सलाह दी जाती है कि वे अपनी फसल के अनुसार तय समय सीमा के भीतर ही पोर्टल पर पंजीकरण करें, अन्यथा पोर्टल बंद होने के बाद आवेदन स्वीकार नहीं किए जाएंगे।
डिजिटल आवेदन प्रक्रिया: चरण-दर-चरण मार्गदर्शिका
बिहार सरकार ने ‘सहज और सरल’ तकनीक को अपनाते हुए आवेदन प्रक्रिया को पूरी तरह ऑनलाइन रखा है। किसान अपने नजदीकी CSC (Common Service Centre) से या स्वयं आधिकारिक पोर्टल पर जाकर आवेदन कर सकते हैं:
- पोर्टल एक्सेस: सबसे पहले सहकारिता विभाग की आधिकारिक वेबसाइट पर जाएं।
- Farmer Corner: होम पेज पर उपलब्ध ‘फसल सहायता योजना’ के विकल्प का चयन करें।
- रजिस्ट्रेशन: अपनी किसान पंजीकरण संख्या दर्ज करें। यदि पंजीकरण नहीं है, तो पहले डीबीटी पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन करना अनिवार्य होगा।
- डेटा एंट्री: अपनी भूमि और फसल से संबंधित सभी जानकारी ध्यानपूर्वक भरें।
- दस्तावेज अपलोड: मांगे गए दस्तावेजों को स्कैन करके अपलोड करें और फाइनल सबमिट करें।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इस योजना का संभावित प्रभाव
इस योजना का सीधा प्रभाव ग्रामीण क्रय शक्ति (Purchasing Power) पर पड़ता है। जब किसान की फसल बर्बाद होती है, तो उसका असर केवल उस परिवार पर नहीं, बल्कि पूरे स्थानीय बाजार पर पड़ता है। डीबीटी के माध्यम से पैसा सीधे बैंक खातों में भेजने से भ्रष्टाचार में कमी आई है और किसानों का भरोसा सरकार पर बढ़ा है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि फसल के नुकसान का आकलन (Crop Loss Assessment) करने की प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी और तेज करने की आवश्यकता है।
सुरेंद्र का नज़रिया: एक निष्पक्ष विश्लेषण
बिहार फसल सहायता योजना रबी 2026 को करीब से देखने पर यह साफ होता है कि बिहार सरकार ‘फसल बीमा’ के बजाय ‘फसल सहायता’ के अपने मॉडल को और मजबूत कर रही है। परंपरागत फसल बीमा योजनाओं में प्रीमियम का बोझ अक्सर किसानों या सरकारों पर भारी पड़ता है, लेकिन बिहार का यह मॉडल सीधे तौर पर आपदा राहत के सिद्धांत पर काम करता है।
सकारात्मक पक्ष:
- समावेशी ढांचा: इस योजना में रैयत (जमीन के मालिक) और गैर-रैयत (बटाईदार) दोनों को शामिल करना एक क्रांतिकारी कदम है, क्योंकि बिहार में खेती का एक बड़ा हिस्सा बटाईदारों के हाथ में है।
- विस्तृत फसल सूची: गेहूं-धान के अलावा सब्जियों और नकदी फसलों (जैसे टमाटर, मिर्च, गोभी) को शामिल करना यह दर्शाता है कि सरकार विविधीकृत खेती (Diversified Farming) को बढ़ावा दे रही है।
चुनौतियां और सुझाव:
डेटा के आधार पर देखें तो अक्सर आवेदन और वास्तविक भुगतान के बीच एक बड़ा समय अंतराल (Time Lag) देखा जाता है। किसानों को मुआवजे की जरूरत फसल कटाई के तुरंत बाद होती है ताकि वे अगली फसल की तैयारी कर सकें। यदि प्रशासन फिजिकल वेरिफिकेशन की प्रक्रिया को सैटेलाइट इमेजिंग और एआई (AI) आधारित तकनीक से जोड़ दे, तो मूल्यांकन में होने वाली देरी को कम किया जा सकता है।
मेरा मानना है कि यह योजना बिहार के किसानों के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच है, बशर्ते किसान समय सीमा (Deadlines) का कड़ाई से पालन करें। रबी सीजन में मौसम का मिजाज अक्सर धोखा देता है, ऐसे में ₹10,000 प्रति हेक्टेयर की यह राशि छोटे किसानों को कर्ज के जाल में फंसने से बचाने के लिए पर्याप्त तो नहीं, लेकिन एक महत्वपूर्ण सहारा जरूर है।